बुधवार, 12 दिसंबर 2018

मोबाइल सिग्नलों पर भ्रांतियां,मिथक एवं सच्चाई



हमारे जीवन के हर एक पहलू में आजमोबाइल उसी तरह शामिल है जिस तरह रोटी, कपड़ा और मकान | आज देश में एक सौ बीस करोड़ मोबाइल कनेक्शन कार्यरत हैं | मोबाइल ने लगभग दो दशकों से हमारे काम-धंधे में,सामाजिक संपर्कों में, अर्थव्यवस्था के तीव्र विकास में, शिक्षा एवं रोजगार में,या यूं कहें तो जीवन के प्रत्येक आयाम में सकारात्मक एवं शानदार भूमिका निभाई है | किन्तु आजकल दूसरी तरफ यह भय फैलाया जा रहा है कि मोबाइल के सिगनल स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालते हैं | मजेदार बात यह कि जो वैज्ञानिक नहीं हैं, जिन्हें विषय का कम ज्ञान है, वह लोग ही आधी-अधूरी बातें इंटरनेट से पढ़कर लोगों में एक भय का वातावरण निर्मित कर रहे हैं |
इस तरह के लोगों को यह समझना होगाकि भ्रांति वश वह देश और समाज का कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं | मोबाइल सिग्नल क्या हैं ? यह एक तरह की गैर-आयनिकविद्युत-चुंबकीय तरंगे हैं,जिनकी क्षमता बहुत कम है | टीवी, रेडियो, प्रकाश इत्यादि सभी इसी तरह की तरंगें हैं | इनमें मोबाइल की तरंगों की क्षमता वास्तव में देखा जाए तो अन्य माध्यमों से निकलने वाली तरंगों से बहुत कम होने के कारण यह मनुष्य या जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं डाल पाती हैं |विश्व स्वास्थ्य संघटन ने पच्चीस हज़ार से ज्यादा शोध के नतीजों से यह माना है कि वर्तमान साक्ष्यों से इस बात की पुष्टि नहीं होती है कि न्यून स्तर के विद्युत चुम्बकीय क्षेत्रों से होने वाले विकिरण से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है | साथ ही इस तरह के अध्ययन विश्व भर में लगातार हो रहे हैं | इंटरनेशनल टेलिकॉम यूनियन ने एक प्रश्न के उत्तर में क्या कहा अब यह भी देख लीजिए | प्रश्न था – क्या बेस स्टेशन के नजदीक रहना सुरक्षित है या बेस स्टेशनों को स्कूल या अस्पतालों के निकट बनाना सुरक्षित है ? जवाब था – ‘हाँ| किसी मोबाइल फोन बेस स्टेशन के निकट रहना सुरक्षित है, क्योंकि वे कम ऊर्जा से चलते हैं, सार्वजनिक स्थानों में इलेक्ट्रो मैग्नेटिक फील्ड के स्तर को ख़ास तौर पर इसके लिए निर्मित किया गया है |
दूरसंचार विभाग द्वारा इस विषय पर सुदृढ़ व्यवस्था बनाई है, जिसके पाँच मुख्य आधार हैं | प्रथम,क्या हमने कुछ मानक बनाए हैं ? भारत उन बहुत कम देशों में है जहां अत्यंत सावधानी पूर्वक विषय का अध्ययन कर मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिएशन की सीमा अन्तराष्ट्रीय गैर-आयनीकरण विकिरण संरक्षण आयोग द्वारा अनुशंसित मौजूदा अधिकतम सीमा का 1/10 कर दिया गया है | यह विश्व के सबसे श्रेष्ठ मानक माने जाते हैं | मानक बनाने का काम हो गया, अब द्वितीय सवाल उठता है - क्या हम इन मानकों का पालन कर रहे हैं ? इस संदर्भ में यह व्यवस्था लागू है कि सभी मोबाइल टावर उपयोग में आने से पूर्व इन मानकों का प्रमाणीकरण करते हैं | दूरसंचार विभाग इन दस्तावेजों की समीक्षा करता है | इसके अतिरिक्त जब भी इनटावरों पर लगे उपकरण में कोई बदलाव होता है तो दुबारा प्रमाणीकरण होना अनिवार्य है | साथ ही हर दो साल में सभी टावरों का पुनः प्रमाणीकरण होता है | तीसरा प्रश्न यह है कि– क्या यह सब वास्तव में हो रहा है ? इस पर कैसे विश्वास करें ?इस हेतु विभाग द्वारा प्रतिवर्ष दस प्रतिशत टावर साईट पर जाकर प्रमाणित अत्याधुनिक उपकरणों की मदद से जांच किए जाते हैं | भारत वर्ष में दूरसंचार विभाग के लगभग40 क्षेत्रीय कार्यालयों के द्वारा यह कार्य लगातार किया जाता है | वार्षिक दस प्रतिशत जांच से यह पुख्ता होता है कि निर्धारित व्यवस्था ठीक तरह से कार्य कर रही है या नहीं | अब चौथा प्रश्न यह है कि इस तरह की जांच के लिए मानव संसाधन एवं उपकरण हैं अथवा नहीं ? इन क्षेत्रीय कार्यालयों में इस हेतु प्रशिक्षित तथा अनुभवी इंजीनियर एवं अधिकारी उपलब्ध हैं, जो लगातार यह कार्य कर रहे हैं, अत्याधुनिक मानक उपकरण भी उपलब्ध हैं | अब पाँचवाँ एवं अंतिम सवाल है कि इन मानकों का उल्लंघन करने वाली मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों पर क्या दंडात्मक कार्यवाही होती है ? जी हाँ, इन उल्लंघनकर्ता कंपनियों पर दस लाख रुपया प्रति ट्रांसमीटर पेनल्टी लगाई जाती है तथा उस टावर को बंद करा दिया जाता है जब तक वह मानक के अनुरूप पुनः जांच में दोष मुक्त नहीं पाया जाता |अब एक सवाल यह भी उपस्थित होता कि जब इन सिग्नलों से कोई समस्या ही नहीं है तो फिर इनके प्रमाणीकरण और जांच की क्या आवश्यकता है! निर्धारित सुरक्षा मानकों का अनुपालन हो रहा है अथवा नहीं यह विभाग की जिम्मेदारी है,अतः एक पारदर्शी व्यवस्था का निर्धारण किया गया है, इससे पब्लिक के बीच विश्वास का वातावरण बनता है |दूरसंचार विभाग केआधिकारिकपोर्टल https://tarangsanchar.gov.in/EMFPortalपरकोई भी व्यक्ति अपने इलाके के मोबाइलटावरों तथा उसके इलेक्ट्रो-मैग्नेटिक सुरक्षा अनुपालन की वस्तु-स्थिति की जानकारी प्राप्त कर सकता है |
विभिन्न आई आई टी एवं आई आई एस सी बेंगलुरु के 24 संकाय सदस्यों ने वर्ष 2013 में एक रिपोर्ट में यह कहा था कि– ‘हम दूरसंचार विभाग, भारत सरकार की अनुशंसाओं को समझदारी वाला और मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय रूप से श्रेष्ठ पद्धति पर आधारित कदम मानते हैं | इस चरण में, कोई अतिरिक्त जानकारी मौजूद नहीं है जो इन अनुशंसाओं पर परिवर्तन की आवश्यकता महसूस कराती हो |
माननीय शिमला उच्च न्यायालय ने 30 नो व्हेंबर 2015 में इस हेतु दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा – ...ऐसा लगता है कुछ मिथक केवल लोगों में भय पैदा करने के लिये फैलाए जा रहे हैं, लेकिन जैसा कि नोबेल विजेता मैरीक्यूरी ने बिलकुल ठीक कहा है “जीवन में किसी चीज से डरने की आवश्यकता नहीं है, केवल उसे समझना जरूरी है | अब समय है कि हम अधिक समझें ताकि कम डर लगे |”
अतः मोबाइल की इस अत्यधिक उन्नत एवं उपयोगी तकनीकजो एक खूबसूरत दुनिया को रच रही है, हम उसे इस तरहकी भ्रांतियों से बचा कर रखें ताकि यह हमें उन्नति के नए शिखरों पर ले जा सके | हमारी आने वाली पीढ़ी हमें अज्ञानी और डरपोक ना समझे इसीलिए हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना होगा |

(लेखक: विनोद गुप्ता )
( लेखक भारतीय दूरसंचार सेवा के अधिकारी हैं, यह उनके व्यक्तिगत विचार हैं )